अंसारी साहब आपने कुछ प्रेरणा डॉ. कलाम से ही ले ली होती

देश के शीर्षस्थ पदों में से एक उपराष्ट्रपति पद पर विराजमान रहे हामिद अंसारी ने अपनी विदाई के समय जो बात कही है, वह किस हद तक सही है, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन ऐसा बोल कर उन्होंने संकुचित मानसिकता का परिचय दिया है। उनकी बातों से ऐसा भी प्रतीत होता है कि वह देश के उपराष्ट्रपति होते हुए भी केवल अल्पसंख्यक वर्ग के ही प्रतिनिधि बन कर रह गए। हो सकता है कि देश के अल्पसंख्यक वर्ग ने उनको यह परेशानी की बातें बताई हों, लेकिन यह भी सत्य है कि उपराष्ट्रपति पद पर रहने के बाद उनको केवल एक पक्ष की बात सुनकर ही मत व्यक्त नहीं करना था। वे उपराष्ट्रपति पद पर रहे, उन्हें पूरे देश की वास्तविकता की पूरी जानकारी रही भी होगी। उन्होंने ऐसा बोलकर उपराष्ट्रपति जैसे पद का भी सम्मान नहीं किया। हामिद अंसारी ने लगभग वैसा ही बयान दिया है, जैसा राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के दिया जाता है। हामिद अंसारी ने पूरे देश की चिन्ता की बात न करते हुए केवल अल्पसंख्यक समुदाय की बात कहकर एक प्रकार से दो साल से दबे विचार को प्रकट कर दिया।

भारत ने उनको दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण पद प्रदान करके उनको सम्मान दिया। वे केवल एक बार नहीं, बल्कि दो बार देश उपराष्ट्रपति पद पर विराजमान रहे। हम जानते हैं कि हमारे देश में कलाम साहब भी एक मुसलमान थे और वे राष्ट्रपति पद पर विराजमान रहे, लेकिन उन्होंने ऐसा काम किया कि वे पूरे देश के हो गए। उन्हें पूरा देश दिखाई देता था। उनकी वाणी भारत की वाणी थी, वे जब भी युवाओं से कोई बात कहते थे तो उनकी दृष्टि में समानता का भाव रहता था। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का कोई भेद नहीं था। उन्होंने पूरे देश को सम्मान दिया, इसलिए देश ने भी उनको भारत रत्न जैसा ही सम्मान दिया। सवाल यह आता है कि हामिद अंसारी पूरे देश के होते हुए भी पूरे देश के नहीं हो पाए। देश का बहुत बड़ा वर्ग आज उनकी बात पर प्रतिक्रिया दे रहा है। वास्तव में उन्हें पूरे देश की जनता की चिन्ता समान रुप से करनी चाहिए, लेकिन उनकी नजर में पहले भी और बाद में भी संकुचन का भाव दिखाई दिया। हम जानते हैं कि उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी उन्होंने देश भाव को प्रधानता नहीं दी। वंदेमातरम नहीं गाया, विजयादशमी के कार्यक्रम में आरती की थाली लेने से इंकार कर दिया, इतना ही नहीं वे राष्ट्र के मूल सिद्धांत धर्मनिरपेक्षता को भी नहीं अपना सके। वर्तमान में भले ही धर्मनिरपेक्षता को एक ही वर्ग के तुष्टिकरण करने के भाव के साथ देखा जाता हो, लेकिन यह सही है कि धर्मनिरपेक्षता में सभी धर्मों को समान भाव से देखे जाने का प्रावधान है।

हो सकता है कि हामिद अंसारी ने जो कहा है वह सही हो, लेकिन सवाल यह आता है कि यह असुरक्षा कहीं न कहीं मुसलमान समाज ने ही खड़ी की है। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को वास्तव में यही कहना चाहिए था कि देश का मुसलमान, हिन्दुओं की पूज्य गौमाता का वध नहीं करे। आज वे अल्पसंख्यकों के असुरक्षित होने की बात कर रहे हैं, जबकि सत्य यह है कि व्यक्ति अपने कार्यों के चलते ही सुरक्षा और असुरक्षा का वातावरण निर्मित करता है।

खैर अब हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति के पद से मुक्त भी हो गए हैं, अब उनके पास पूरा समय भी है। उन्हें देश की स्थिति का ज्ञान भी है। जाते जाते जो चिंता उन्होंने व्यक्त की है, उसे दूर करने के उपाय भी करना चाहिए। लेकिन उन्हें यह भी ध्यान में रखना होगा कि उनकी नजर में भारत की दृष्टि होनी चाहिए। एक समुदाय की नहीं। जब वे एक समुदाय की भावना को जानकर भाव व्यक्त करेंगे तो स्वाभाविक रुप से सवाल भी उठेंगे। फिर उन सवालों का जवाब किस प्रकार से दे पाएंगे, यह सोचने की बात है।

वास्तव में हामिद अंसारी ही नहीं बल्कि देश के अंदर ऐसा वातावरण बनता हुआ दिखाई दे रहा, जिसमें समाधान की बात नहीं है, समस्याएं खड़ी करना हमारे देश की नियति सी बन गई है। देश का पूरा समाज राजनीतिक और संवैधानिक नेतृत्व से ऐसी आशा लगाए बैठा है, जो समस्या का समाधान प्रस्तुत करे। हामिद अंसारी से यही आशा थी कि वे समस्या का समाधान प्रस्तुत करते, लेकिन वे तो समस्या खड़ी करके चले गए। एक ऐसी समस्या जो तुष्टिकरण के भाव को पैदा कर सकती है। वास्तव में तुष्टिकरण का भाव किसी भी समाज का सांत्वना दे सकता है, स्थायी समाधान नहीं बन सकता। जब उपराष्ट्रपति पद पर बैठने वाला व्यक्ति समाधान नहीं बता सकता तो किससे उम्मीद की जाए। अब समस्या नहीं, समाधान का काल है। जनता के सामने समस्याओं का अंबार है। जिसका अंत करने में पूरा देश लगा है, हामिद अंसारी को भी समाधान के मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहिए था। सही समय की मांग है और राष्ट्र की आवश्यकता भी है।

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