वैभव लक्ष्मी व्रत का पाठ

मुझे नहीं मालूम कि कब से वैभव लक्ष्मी व्रत कथा लोकप्रिय हुआ है लेकिन इस व्रत कथा का पाठ रोचक लगा। कई समृद्ध परिवारों में यह कथा चल रही है। इक्कीस हफ्ते तक इसका व्रत रखा जाता है। मेरे घर में कथा-वथा नहीं होती है लेकिन पड़ोसी से ही श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की किताब प्रसाद के रूप में मेरे घर में आ गई।

इस कथा में तीन कहानियां हैं। पहली कहानी महाराष्ट्र के शहर मुंबई की है। मनोज और शोभा के परिवार की कहानी। मनोज क्लर्क है। अछा इंसान है। शोभा भी। सब मिसाल देते हैं। अचानक मनोज बुरी संगत में पड़ जाता है। नशे की लत में घर बर्बाद हो जाता है। शोभा और उसका बचा भूखा है। एक सुंदर स्त्री घर आती है। वैभव लक्ष्मी व्रत रखने की सलाह देती है। सब कुछ अछा हो जाता है। मनोज बुरे से अछे रास्ते पर आ जाता है।
इस व्रत में नए वस्त्र पहनने के अलावा एक रोचक शर्त भी है। जो स्त्री व्रत रखेगी वो सारा दिन किसी की चुगली नहीं करेगी। चुगली एक बड़ी व्यावहारिक सामाजिक समस्या है। शोभा भी किसी की चुगली नहीं करती है। मन में मां लक्ष्मी का रटन करती है। इक्कीस शुक्रवार तक व्रत रखने के बाद सब सामान्य हो जाता है। एक शर्त और है। व्रत के बाद कथा पुस्तिका सात या इक्कीस औरतों के बीच प्रसाद के साथ वितरित करनी होती है।
दूसरी कहानी अशोक सक्सेना की है। जो कम्प्यूटर में पूरा कोर्स कर लिया था। अर्थशास्त्री( अर्थशास्त्र नहीं) विषय में एम. ए कि शिक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के पश्चात बेचारे अशोक सक्सेना को कहीन नौकरी नहीं मिल सकी। वो रोज़ परेशान रहता है। उसकी मां वैभव लक्ष्मी का व्रत रखती है और नौकरी मिल जाती है। अशोक इक्कीस पुस्तकें बांट देता है।
मुंबई में कम पैसे पर क्लर्की,बर्बादी,अशोक सक्सेना का कम्प्यूटर कोर्स करना और नौकरी न मिलना। ये सब आज के समय के संकट हैं। दूसरा संकट जो कथाओं में आम होता है,निसंतान होने और विवाह का संकट। इस व्रत के रखने से दोनों दूर हो जाते हैं। चमनलाल को हार्ट अटैक हो जाता है। उसके साथ खांसी बुखार का भी रोग लग जाता है। कोई दवा काम नहीं करती है।ग्यारह शुक्रवार वैभव लक्ष्मी का विधि पूर्वक व्रत रखने से चमनलाल ठीक हो जाते हैं।
बड़े शहरों में इस तरह की कथा काफी लोकप्रिय हो रही है। मां संतोषी मां का व्रत अब कम औरतें करती हैं। आर्थिक उदारीकरण के साथ समृद्धि बनाये रखने के लिए लोग वैभव लक्ष्मी का व्रत रखते हैं। एक महिला से फोन कर पूछा तो उन्होंने कहा कि हाल ही में सुना है इसलिए करती हूं।
भुटानी पब्लिकेशन ने व्रत कथा छापी है। पहले पेज में लिखा है कि यह तुरन्त फल देने वाली व्रत कथा है। इस पुस्तक के पाठ द्वारा आपके भाग्य में परिवर्तन होगा। परन्तु इसके लिए हर प्राणी को व्रत करने की शास्त्रीय विधि एवं व्रत कथा का पाठ ठीक नियमानुसार करना होगा। व्रत करने के साथ एक मात्र पुस्तक भुटानी पबिल्केशन(यही छपा है)में प्रकाशित कथा ही है जो आपके लिए धन के वैभव,ऐश्वर्य,सन्तान सुख व समृद्धि के द्वार खोल सकती है। हस्ता- संपादक।
संपादक का आदेश जारी रहता है। आगे लिखते हैं- पुस्तक खरीदने से पहले पुस्तक पर छपा भुटानी पब्लिकेशन का नाम अवश्य पढ़ लें। वैधानिक सूचना- इस पुस्तक का समस्त अधिकार प्रकाशकाधीन है। कोई भी सजन इसका कोई भी अंश घटा कर या तोड़ मरोड़ कर छापने की चेष्टा न करें। अन्यथा समस्त हजऱ्े खर्चे व कानूनी कार्यवाही के लिए जि़म्मेदार वह स्वयं होंगे।
इस व्रत कथा की लेखिका आशा रानी गुप्ता हैं। अब उनसे संपर्क करने की कोशिश करूंगा कि उन्होंने वैभव लक्ष्मी कथा के लिए ये कहानियां किस आधार पर चुनी है। अशोक सक्सेना की कहानी उनके दिमाग की उपज है या सत्य कथा है। आशा रानी गुप्ता ने लिखा है कि वैभव लक्ष्मी मां का पूजन देव काल से अब तक निरन्तर होता आ रहा है।
पूजा पाठ की कथाओं का अध्ययन खूब हुआ है। लेकिन कथायें कैसे बदल रही हैं। फिर से देखने का टाइम है। कथाओं में पात्रों की चिंतायें आधुनिक हो रही हैं। कंप्यूटर कोर्स वाला बेरोजग़ार तो समुद्र मंथन के समय पैदा नहीं हुआ होगा। संदर्भ बदल रहे हैं मगर मौलिक चिंतायें वही हैं। संतान,नौकरी,बर्बादी,रोग और विवाह। हमारे समाज ने इन मुद्दों पर लोगों का जीवन नरक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शायद इसी हकीकत को समझ कर आशा रानी गुप्ता ने कथा का प्लाट तैयार किया है। हर कथा के बाद कम से कम सात और अधिक से अधिक एक सौ एक घरों में पहुंचने वाली आशा रानी गुप्ता की यह कथा किसी प्रेमचंद की तुलना में अधिक रफ्तार से पहुंच रही है। दस रुपये की यह पुस्तिका है। एक कथा के बाद बंटने वाली पुस्तिका की शर्त से भुटानी प्रकाशक के घर में लक्ष्मी खूब आती होंगी। किस पुराण में किस ऋषि मुनी ने आदेश दिया है कि पुराण का पाठ करो और पांच कॉपी बांटों। हमारे डर का अछा आध्यात्मिक इस्तमाल है। मैं पूजा पाठ का विरोधी नहीं हूं। जिसे शांती मिलती है वो खूब करे। मगर कर्मकांड बाद में जोड़े जाते हैं। यह हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए। कर्मकांड सिर्फ कारोबार के लिए होता है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा और पूजन विधि

मां तो मां होती है। उसकी हर सांस से बचों के लिए दुआएं निकलती हैं। आज गुरुवार के दिन पुत्रवती माताओं के लिए बेशकीमती होगा। इस दिन मां अपने बचों के दीर्घजीवन के लिए अहोई माता से आशीष मांगेंगी।
अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवाल पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवाल पर टांग दिया जाता है।
होई के चित्रांकन में यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बचों की आकृतियां बना दी जाती हैं।
उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोईअष्टमी की दो लोक कथाएं प्रचलित हैं।

अहोई अष्टमी व्रत विधि
विधि-विधान: अहोई व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान करें और पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए, मैं अहोई माता का व्रत कर रही हूं, ऐसा संकल्प करें। अहोई माता मेरी संतान को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखे। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए माता पर्वती की पूजा करें। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। संध्या काल में इन चित्रों की पूजा करें। अहोई पूजा में एक अन्य विधान यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है जिसे सेह या स्याहु कहते हैं। इस सेह की पूजा रोली, अक्षत, दूध व भात से की जाती है। पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें। पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुने और सुनाएं।
पूजा के पश्चात सासु-मां के पैर छूएं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इसके पश्चात व्रती अन्न जल ग्रहण करें।

अहोई अष्टमी व्रत कथा
उसमें से एक कथा में साहूकार की पुत्री के द्वारा घर को लीपने के लिए मिट्टी लाते समय मिट्टी खोदने हेतु खुरपा(कुदाल) चलाने से साही के बचों के मरने से संबंधित है। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कोई भी काम अत्यंत सावधानी से करना चाहिए अन्यथा हमारी जरा सी गलती से किसी का ऐसा बडा नुकसान हो सकता है, जिसकी हम भरपाई न कर सकें और तब हमें उसका कठोर प्रायश्चित करना पडेगा। इस कथा से अहिंसा की प्रेरणा भी मिलती है। अहोईअष्टमी की दूसरी कथा मथुरा जिले में स्थित राधाकुण्डमें स्नान करने से संतान-सुख की प्राप्ति के संदर्भ में है। अहोईअष्टमी के दिन पेठे का दान करें।

आरती श्री अहोई माता की आरती
जय अहोई माता, जय अहोई माता!
तुमको निसदिन ध्यावत हर विष्णु विधाता। टेक।।
ब्राहमणी, रुद्राणी, कमला तू ही है जगमाता।
सूर्य-चंद्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता।। जय।।
माता रूप निरंजन सुख-सम्पत्ति दाता।।
जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता।। जय।।
तू ही पाताल बसंती, तू ही है शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता।। जय।।
जिस घर थारो वासा वाहि में गुण आता।।
कर न सके सोई कर ले मन नहीं धडक़ाता।। जय।।
तुम बिन सुख न होवे न कोई पुत्र पाता।
खान-पान का वैभव तुम बिन नहीं आता।। जय।।
शुभ गुण सुंदर युक्ता क्षीर निधि जाता।
रतन चतुर्दश तोकू कोई नहीं पाता।। जय।।
श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता।
उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता।।

धनतेरस

महालक्ष्मी देवी
अन्य नाम धन्वन्तरि जयन्ती
अनुयायी हिंदू, भारतीय
उद्देश्य घरों में दीपावली की सजावट भी आज ही से प्रारम्भ हो जाती है। इस दिन घरों को स्वछ कर, लीप—पोतकर, चौक, रंगोली बना सायंकाल के समय दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है।
प्रारम्भ पौराणिक काल
तिथि कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी
धार्मिक मान्यता इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है।
अन्य जानकारी इस दिन से कोई किसी को अपनी वस्तु उधार नहीं देता। इसके उपलक्ष्य में बाज़ारों से नए बर्तन, वस्त्र, दीपावली पूजन हेतु लक्ष्मी-गणेश, खिलौने, खील-बताशे तथा सोने-चांदी के जेवर आदि भी खऱीदे जाते हैं।
यह त्योहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है। हमारे देश में सर्वाधिक धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार दीपावली का प्रारंभ धनतेरस से हो जाता है। इसी दिन से घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ कर देते हैं। दीपावली के लिए विविध वस्तुओं की खऱीद आज की जाती है। इस दिन से कोई किसी को अपनी वस्तु उधार नहीं देता। इसके उपलक्ष्य में बाज़ारों से नए बर्तन, वस्त्र, दीपावली पूजन हेतु लक्ष्मी-गणेश, खिलौने, खील-बताशे तथा सोने-चांदी के जेवर आदि भी खऱीदे जाते हैं।
आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि वैद्य समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती भी कहते हैं। इसीलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है। क्चद्यशष्द्मह्नह्वशह्लद्ग-ष्द्यशह्यद्ग.द्दद्बद्घ

महत्त्व
धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों में इस बारे में कहा है कि जिन परिवारों में धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती। घरों में दीपावली की सजावट भी आज ही से प्रारम्भ हो जाती है। इस दिन घरों को स्वछ कर, लीप—पोतकर, चौक, रंगोली बना सायंकाल के समय दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है। इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना व नए बर्तन खऱीदना शुभ माना गया है। इस दिन चांदी के बर्तन खऱीदने से तो अत्यधिक पुण्य लाभ होता है। इस दिन हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर लगातार तीन बार अपने शरीर पर फेरना तथा कुंकुम लगाना चाहिए। कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, कुआं, बावली, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए। तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी व अमावस्या की सन्ध्या को जलती लकड़ी की मशाल से पितरों का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

पूजन विधि
इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। यह पूजा दिन में नहीं की जाती अपितु रात्रि होते समय यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है।
इस दिन यम के लिए आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता हैं इस दीप को जमदीवा अर्थात यमराज का दीपक कहा जाता है।
रात को घर की स्त्रियां दीपक में तेल डालकर नई रूई की बत्ती बनाकर, चार बत्तियां जलाती हैं। दीपक की बत्ती दक्षिण दिशा की ओर रखनी चाहिए।
जल, रोली, फूल, चावल, गुड़, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर स्त्रियां यम का पूजन करती हैं। चूंकि यह दीपक मृत्यु के नियन्त्रक देव यमराज के निमित्त जलाया जाता है, अत: दीप जलाते समय पूर्ण श्रद्धा से उन्हें नमन तो करें ही, साथ ही यह भी प्रार्थना करें कि वे आपके परिवार पर दया दृष्टि बनाए रखें और किसी की अकाल मृत्यु न हो।

धन्वन्तरि जयन्ती
इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन किया जाता है। पूरे वर्ष में एक मात्र यही वह दिन है, जब मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। यह पूजा दिन में नहीं की जाती अपितु रात्रि होते समय यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है।
आज ही के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता धन्वन्तरि वैद्य समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रगट हुए थे, इसलिए धनतेरस को धन्वन्तरि जयन्ती भी कहते हैं। इसीलिए वैद्य-हकीम और ब्राह्मण समाज आज धन्वन्तरि भगवान का पूजन कर धन्वन्तरि जयन्ती मनाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि धनतेरस आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन खऱीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धन्वंतरि को अर्पित करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है। धन्वंतरि ईसा से लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व हुए थे। वह काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे। उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्त्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं। उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए इस तरह सुश्रुत संहिता किसी एक का नहीं, बल्कि धन्वंतरि, दिवोदास और सुश्रुत तीनों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है। धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उनके जीवन के साथ अमृत का कलश जुड़ा है। वह भी सोने का कलश। अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था। उन्होंने कहा कि जरा मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। सुश्रुत उनके रासायनिक प्रयोग के उल्लेख हैं। धन्वंतरि के संप्रदाय में सौ प्रकार की मृत्यु है। उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही निदान और चिकित्सा हैं। आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है। पुरुष अथवा स्त्री को अपने हाथ के नाप से 120 उंगली लंबा होना चाहिए, जबकि छाती और कमर अठारह उंगली। शरीर के एक-एक अवयव की स्वस्थ और अस्वस्थ माप धन्वंतरि ने बताई है। उन्होंने चिकित्सा के अलावा फसलों का भी गहन अध्ययन किया है। पशु-पक्षियों के स्वभाव, उनके मांस के गुण-अवगुण और उनके भेद भी उन्हें ज्ञात थे। मानव की भोय सामग्री का जितना वैज्ञानिक व सांगोपांग विवेचन धन्वंतरि और सुश्रुत ने किया है, वह आज के युग में भी प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण है।

धनतेरस की कथा
एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे, लक्ष्मी जी ने भी साथ चलने का आग्रह किया। विष्णु जी बोले- यदि मैं जो बात कहूं, वैसे ही मानो, तो चलो। लक्ष्मी जी ने स्वीकार किया और भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी सहित भूमण्डल पर आए। कुछ देर बाद एक स्थान पर भगवान विष्णु लक्ष्मी से बोले-जब तक मैं न आऊं, तुम यहाँ ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत देखना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी को कौतुक उत्पन्न हुआ कि आखऱि दक्षिण दिशा में क्या है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं दक्षिण में क्यों गए, कोई रहस्य ज़रूर है। लक्ष्मी जी से रहा न गया, योंही भगवान ने राह पकड़ी, त्योंही लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही दूर पर सरसों का खेत दिखाई दिया। वह ख़ूब फूला था। वे उधर ही चलीं। सरसों की शोभा से वे मुग्ध हो गईं और उसके फूल तोडक़र अपना शृंगार किया और आगे चलीं। आगे गन्ने (ईख) का खेत खड़ा था। लक्ष्मी जी ने चार गन्ने लिए और रस चूसने लगीं। उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज़ होकर शाप दिया- मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानीं और यह किसान की चोरी का अपराध कर बैठीं। अब तुम उस किसान की 12 वर्ष तक इस अपराध की सज़ा के रूप में सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोडक़र क्षीरसागर चले गए। लक्ष्मी किसान के घर रहने लगीं।
वह किसान अति दरिद्र था। लक्ष्मीजी ने किसान की पत्नी से कहा- तुम स्नान कर पहले इस मेरी बनाई देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने लक्ष्मी के आदेशानुसार ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया और लक्ष्मी से जगमग होने लगा। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द से कट गए। तत्पश्चात 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं। विष्णुजी, लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। लक्ष्मी भी बिना किसान की मर्जी वहाँ से जाने को तैयार न थीं। तब विष्णुजी ने एक चतुराई की। विष्णुजी जिस दिन लक्ष्मी को लेने आए थे, उस दिन वारुणी पर्व था। अत: किसान को वारुणी पर्व का महत्त्व समझाते हुए भगवान ने कहा- तुम परिवार सहित गंगा में जाकर स्नान करो और इन कौडिय़ों को भी जल में छोड़ देना। जब तक तुम नहीं लौटोगे, तब तक मैं लक्ष्मी को नहीं ले जाऊंगा। लक्ष्मीजी ने किसान को चार कौडिय़ां गंगा के देने को दी। किसान ने वैसा ही किया। वह सपरिवार गंगा स्नान करने के लिए चला। जैसे ही उसने गंगा में कौडिय़ां डालीं, वैसे ही चार हाथ गंगा में से निकले और वे कौडिय़ां ले लीं। तब किसान को आश्चर्य हुआ कि वह तो कोई देवी है। तब किसान ने गंगाजी से पूछा-माता! ये चार भुजाएं किसकी हैं? गंगाजी बोलीं- हे किसान! वे चारों हाथ मेरे ही थे। तूने जो कौडिय़ां भेंट दी हैं, वे किसकी दी हुई हैं? किसान ने कहा- मेरे घर जो स्त्री आई है, उन्होंने ही दी हैं।
इस पर गंगाजी बोलीं- तुम्हारे घर जो स्त्री आई है वह साक्षात लक्ष्मी हैं और पुरुष विष्णु भगवान हैं। तुम लक्ष्मी को जाने मत देना, नहीं तो पुन: निर्धन हो जाआगे। यह सुन किसान घर लौट आया। वहां लक्ष्मी और विष्णु भगवान जाने को तैयार बैठे थे। किसान ने लक्ष्मीजी का आंचल पकड़ा और बोला- मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा। तब भगवान ने किसान से कहा- इन्हें कौन जाने देता है, परन्तु ये तो चंचला हैं, कहीं ठहरती ही नहीं, इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था, जो कि 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला- नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा। तुम कोई दूसरी स्त्री यहाँ से ले जाओ। तब लक्ष्मीजी ने कहा-हे किसान! तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं जैसा करो। कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वछ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सांयकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी। मैं इस दिन की पूजा करने से वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। मुझे रखना है तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करना। यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं और भगवान देखते ही रह गए। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। इसी भांति वह हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा करने लगा।

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